Thursday, 3 March 2016

To save us from long term self destruction


धन-धान्य की चाह किसे नहीं होती, हर कोई सुख समृद्धि चाहता है। बात इतनी सी है कि कुछ लोग सन्तुष्त रहते हैं और काफी किफायत से जीते हैं, वह लोग जो हैं उसकी इज्जत करते हैं, मेरे ख्याल से यह लोग जिनके पास भौतिक वस्तुएं हैं, उनका यह लोग पूर्ण रूप से उपयोग करते हैं, और अगर कोई वस्तु खराब हो भी जाए तो उसको ठीक करने का प्रयास भी भरपूर करते हैं, या फिर अगर वह वस्तु ठीक न हो सके तो अगली सबसे बहतरीन वस्तु खरीदलें, और उसे रगड़ डालें अर्थात खूब प्रयोग करें- तब तक जब तक वह उपयोग करने लायक ही न रहे। और यह cycle चलता रहे।
हमारे बड़े-बूढ़े कहते हैं कि फिज़ूल खर्ची से बचना चाहिए, और यही बात , जो लोग समझते हैं, वह लोग अति लाभदायक स्थिति में होते हैं, या जो कोई भी में धन का सही तरीके से निवेष करता है, वह व्यक्ति परम सुखी रहता है, और जहॉ शौक़ की बात आती है, वहॉ पर फिर उनके ऊपर निर्भर है कि वह क्या करते हैं और क्या सोचते हैं।
इसी से जुड़ा Consumerism एक अन्ग्रेज़ी शब्द है, जिसको मैं फिलहाल सच होते देखा जा रहा है। But still, let’s see what happens. अगर हम consumerism के जाल में फंस गए तो हमें स्वयं को ढालना परिस्थितियों के हिसाब से, हमें मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि हम मनुष्यों को comfort zone का आदि रहना भारी पड़ सकता है वह भी तब जब हमें हमारे comfort zone से बाहर निकालने वाली शक्तियॉ हमारे बस की न हों।

आशा करता हूँ कि हम सब खुद को बचा सकेंगे इस consumerism और comfort zone से।

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