Saturday, 5 March 2016

Incredible, never-seen-before courage, the hope of Mankind, the gift of the Universe : India that is Bhaarath.

अद्भुत अधम्म साहस की यह परिभाषा है, यह मिट्टी मानवता की आशा है, ये सृष्टि का वर्दान है, यह अवतार नहीं यह इंसान है, शक्तिमान!!!!!
ऊपर लिखी हुई पंक्तियों का origin SHAKTIMAAN नामक TV Series से है जो 1990 कि दशक में खूब प्रचलित था।
इन पंक्तियों में संयोगवश सत्य भी कहा गया है  जो निम्नलिखित में कुछ इस प्रकार है:-
अद्भुत अधम्म साहस की यह परिभाषा है”- साहस, इस बात का कि भारत आज भी जीवित है। जीओ और जीने दो की परम भाषा यहॉ पर हर कोई समझता है और क्षमा करने का साहस करना जो कि कई लोगों के बस की बात नहीं होती उसका भी यहॉ पर भरपूर नज़ारा देखने को मिलता है।
यह मिट्टी मानवता की आशा है”- भारत की मिट्टी में उपजाऊपन बहुत है, यहॉ पर सूरज की रोश्नी में सब कुछ उगाया जा सकता है तथा पशुपालन से भी बहुत लाभ होता है।
भारत के खनिज सम्पदा के बारे में हर कोई जानता है, जो विश्व में सबसे ज़्यादा और यह बहुमूल्य है। इसका हमें सदुपयोग तथा रक्षा करनी चाहिए क्योंकि यह हमारी धरोहर है। किसी और का इस पर हक नहीं है, क्योंकि यह हमारी जागीर है
, इस पर हम भारतीयों का सर्वप्रथम हक बनता है।
ये सृष्टि का वर्दान है”- भारत के पास योग, आयुर्वेद जैसे अद्भुत ज्ञान हैं, और भी कई विद्याएं हैं जिन्हें समय की मार के कारण खो दिया गया है, मगर धीमे-धीमे वह सब ज्ञान को वापस से अर्जित किया जा रहा है।

भारत का जीर्णोद्धार/पुनर्उत्थान हो रहा है। भारत अब फिर से महा शक्ति बनने के लिए अपने सबसे अनमोल धरोहर-नागरिकों के महत्तव समझ चुका है, अब संघर्ष की बारी है, इनहीं धरोहर/सम्पदा को अब बचाना है और भारत के लिए उपयोग करना है, क्योंकि क्षत्रुओं की कमी नहीं, हमें ईंट का जवाब पत्थरों से भी ज़्यादा भीषण हथियारों से करना है, क्योंकि हमने बहुत सहन किया है, अब और नहीं।
Beat your enemy into submission so that they don’t bother you again and let you and people related to you live in peace
 and
enemies don’t be enemies anymore.

Friday, 4 March 2016

Fight for the nation and sacrifice Gandhian beliefs for the nation is the only enlightenment as of now.

वीरगति-परमगति राष्ट्रहित के लिए
चिड़ियों को मैं बाज़ से लड़ाऊंगा, गीदड़ों को शेर बनाऊंगा, एक को सवा लाख से लड़ाऊंगा तभी मैं गोविंद सिन्ह कहलाऊंगा – गुरु गोविन्द सिन्ह जी।
तुम मुझे खूँन दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा – सुभाष चन्द्र बोस।
झनझविला भगव्याच्या समान तुम्ही,
जागविले मरगळलेले मर्द मावळे तुम्ही,
घड़विले श्रीं चे स्वराज्य तुम्ही,
ऐसे श्रीमंत योगी अखंड महाराष्ट्राचे कुलदैवत,
श्री राजा शिवछत्रपती तुम्ही... !! – छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रशंसा।
आज इन्हीं नारों के गूँज की आवश्य्कता फिर से पड़ रही है। आज ऐसे ही वीर, दृढ़ और राष्ट्र के प्रति समर्पित तथा इस राष्ट्र के लोगों को अपने से पहले रखने वाले लोग तथा ऐसी सोच रखने वाले लोगों की आवश्य्कता है। भारत राष्ट्र के लोग तथा जो कुछ भी भारतीय है वह आज cultural terrorism के कारण खोता जा रहा है। और घमण्ड कि हमारी संस्कृति महान है, इसे कभी नहीं मिटाया जा सकता गलत है। हम अगर राजीव मल्होत्रा जी के विचार पढ़ेंगे तो हम यह पाएंगे कि आज हमें विदेशी लोग हमारे बारे में हमें ही समझाते हैं, और वह समझाइश ऐसी है कि हम खुद को ही गालियॉ अर्थात् खुद के ही पुर्खों को गालियॉ देते हैं। सिर्फ यह सोचकर बैठने से कुछ काम नहीं चलना कि कुछ नहीं होगा, क्योंकि पर्दों के पीछे क्या-क्या होता है वह हम आम जन नहीं जानते।
इस बात में कोई संकोच नहीं कि वह कैसी बेज़ती रही होगी जिससे रोज़ लड़ कर हमारे पुर्खों ने हमें इस स्थिति में रखा है जहाँ हम अपने आराम के जीवन व्यतीत कर रहे हैं। किन्तु हम लोग भी किसी के पुर्खे बन जाएन्गे, और उनके लिए भी हमें भविष्य को और सवारना है। 
This cultural terrorism has been going on right before we got independence till date. हमारे अनमोल ज्ञान को अब लोग अंधविश्वास कहते हैं, जबकि विज्ञान वहॉ पर धीमी गति से, पहुँच रहा है, और जहॉ पहुँच गया है, तो उस पर अपना ट्रेड मार्क लगा कर हमें ही बेच रहे हैं, this is the height of plagiarism.

एक बात और, जो यहॉ पर इशारों में लिखा जा रहा है, वह यह है – “किसी भी राष्ट्र को चरखा घुमा के कभी भी आज़ाद कराया नहीं जा सकता !”
"The object of war is not to die for your country but to make the other bastard die for his." - George S. Patton

Thursday, 3 March 2016

To save us from long term self destruction


धन-धान्य की चाह किसे नहीं होती, हर कोई सुख समृद्धि चाहता है। बात इतनी सी है कि कुछ लोग सन्तुष्त रहते हैं और काफी किफायत से जीते हैं, वह लोग जो हैं उसकी इज्जत करते हैं, मेरे ख्याल से यह लोग जिनके पास भौतिक वस्तुएं हैं, उनका यह लोग पूर्ण रूप से उपयोग करते हैं, और अगर कोई वस्तु खराब हो भी जाए तो उसको ठीक करने का प्रयास भी भरपूर करते हैं, या फिर अगर वह वस्तु ठीक न हो सके तो अगली सबसे बहतरीन वस्तु खरीदलें, और उसे रगड़ डालें अर्थात खूब प्रयोग करें- तब तक जब तक वह उपयोग करने लायक ही न रहे। और यह cycle चलता रहे।
हमारे बड़े-बूढ़े कहते हैं कि फिज़ूल खर्ची से बचना चाहिए, और यही बात , जो लोग समझते हैं, वह लोग अति लाभदायक स्थिति में होते हैं, या जो कोई भी में धन का सही तरीके से निवेष करता है, वह व्यक्ति परम सुखी रहता है, और जहॉ शौक़ की बात आती है, वहॉ पर फिर उनके ऊपर निर्भर है कि वह क्या करते हैं और क्या सोचते हैं।
इसी से जुड़ा Consumerism एक अन्ग्रेज़ी शब्द है, जिसको मैं फिलहाल सच होते देखा जा रहा है। But still, let’s see what happens. अगर हम consumerism के जाल में फंस गए तो हमें स्वयं को ढालना परिस्थितियों के हिसाब से, हमें मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि हम मनुष्यों को comfort zone का आदि रहना भारी पड़ सकता है वह भी तब जब हमें हमारे comfort zone से बाहर निकालने वाली शक्तियॉ हमारे बस की न हों।

आशा करता हूँ कि हम सब खुद को बचा सकेंगे इस consumerism और comfort zone से।

For all- "may the peace and prosperity stays with them, may the love prevail, may all the sorrows end". May there be a perfect society as such.

सर्वे भवन्तु सुखिन:  सरवे सन्तु निरामया:  सर्वे भद्राणि पश्यन्तु  माकश्चिद्दुखभागवेत् ।।
ओम् शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।
विद्या ददाति विनयम्, विनयम् ददाति पात्रक्त्वाम,  पात्रक्त्वाधनमापनोति, धनाधर्मम् तत्सुखम् ।।
इन्सान आज के पागल हो गए हैं। आज हर किसी की यही शिकायत है कि चाहे कितना भी पैसा कमा लो, उनके लिए कम ही रहता है। ईश्वर की कृपा हम सभ पर रही है परन्तु सब यह भूल गए हैं कि अति सर्वत्र वर्जयेत्यानि अति किसी भी चीज़ की नहीं होनी चाहिए। इससे हमारा ही नुकसान है।
गौर करने कि बात है कि आज अमीरों के साथ दान-धर्म करने की क्षमता वक्त के साथ घटती जा रही है। मसलन, आज कोई भी अगर किसी को भी कुछ भी देता है, तो यह सोच के देता - बदले में देने वाले को फायदा हो। परन्तु लोग आज भी उतने ही कृतज्ञ हैं जितना पहले थे। मान लैं कि आप किसी की मदद करते हैं और वह आपकी ओर अपने चहरे पर खुशी की भावना से देखता है तो वह कृतज्ञता की भावना है, जैसे कि किसी वृद्ध की सहायता करना तो बदले में उनका आशिर्वाद मिलना, किसी छोटे बच्चे की मदद करना तो उसकी आखों में अपने प्रति आदर भावना को देखना और अगर हुआ तो उसकी प्रसन्नता के भाव आपके गाल पर एक स्नेह युक्त चुम्मी लेना के रूप में उभरना। मैंने यह दो आयु वर्ग इसलिए लिखें हैं क्योंकि पहले वर्ग ने अपनी ज़िन्दगी जी ली और वो दुनिया को इतना देख चुके हैं कि उन्हें किसी युवा या धनी व्यक्ति से सहायता की आशा नहीं होती, और वह जब कृतज्ञता से जब अपनी शुभकामनाएं देते हैं तो उस शुभकामना की शक्ति अपने माता-पिता की शुभकामना के समान होती है। दूसरे वर्ग की बात करें तो वह वर्ग का मन छल कपट से मुक्त है और पवित्र है, पवित्र मन की तो बात ही अलग होती है।

मैंने इस विषय पर इसलिए लिखा क्योंकि मैंने Rhonda Byrne की किताब The Secret पढ़ी और उस सन्देश को रोज़मर्रा के जीवन से जोड़ पर देखने की कोशिश की है। ऐसे ही अगर धनी लोग दान धर्म करते हैं, तो सोच सकते हैं कि वह कितने शक्तिशाली लोग बन सकते हैं, मगर यह इच्छा उनके ऊपर है, आशा तो यही है, कयोंकि 4-5 गाड़ियॉ होने के बाद भी कईयों को चैन नहीं मिलता, कईयों को बस BMW या AUDI या latest model की चाह है। अब देखते हैं आगे क्या होता है... प्रार्थना तो यही है, अब आगे ईश्वर की इच्छा, as willed by the powers (beyond) that be.