वीरगति-परमगति राष्ट्रहित के लिए
चिड़ियों को मैं बाज़ से लड़ाऊंगा, गीदड़ों को शेर बनाऊंगा, एक को सवा लाख से
लड़ाऊंगा तभी मैं गोविंद सिन्ह कहलाऊंगा – गुरु गोविन्द सिन्ह जी।
तुम मुझे खूँन दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा – सुभाष चन्द्र बोस।
झनझविला
भगव्याच्या समान तुम्ही,
जागविले मरगळलेले मर्द मावळे तुम्ही,
घड़विले श्रीं चे स्वराज्य तुम्ही,
ऐसे श्रीमंत योगी अखंड महाराष्ट्राचे कुलदैवत,
श्री राजा शिवछत्रपती तुम्ही... !! – छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रशंसा।
जागविले मरगळलेले मर्द मावळे तुम्ही,
घड़विले श्रीं चे स्वराज्य तुम्ही,
ऐसे श्रीमंत योगी अखंड महाराष्ट्राचे कुलदैवत,
श्री राजा शिवछत्रपती तुम्ही... !! – छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रशंसा।
आज इन्हीं नारों के गूँज की आवश्य्कता फिर से पड़ रही है। आज ऐसे ही वीर, दृढ़
और राष्ट्र के प्रति समर्पित तथा इस राष्ट्र के लोगों को अपने से पहले रखने वाले
लोग तथा ऐसी सोच रखने वाले लोगों की आवश्य्कता है। भारत राष्ट्र के लोग तथा जो कुछ
भी भारतीय है वह आज cultural terrorism के कारण खोता जा रहा है। और घमण्ड कि हमारी
संस्कृति महान है, इसे कभी नहीं मिटाया जा सकता गलत है। हम अगर राजीव मल्होत्रा जी
के विचार पढ़ेंगे तो हम यह पाएंगे कि आज हमें विदेशी लोग हमारे बारे में हमें ही
समझाते हैं, और वह समझाइश ऐसी है कि हम खुद को ही गालियॉ अर्थात् खुद के ही पुर्खों
को गालियॉ देते हैं। सिर्फ यह सोचकर बैठने से कुछ काम नहीं चलना कि कुछ नहीं होगा,
क्योंकि पर्दों के पीछे क्या-क्या होता है वह हम आम जन नहीं जानते।
इस बात में कोई संकोच नहीं कि वह कैसी बेज़ती रही होगी जिससे रोज़ लड़ कर
हमारे पुर्खों ने हमें इस स्थिति में रखा है जहाँ हम अपने आराम के जीवन व्यतीत कर
रहे हैं। किन्तु हम लोग भी किसी के पुर्खे बन जाएन्गे, और उनके लिए भी हमें भविष्य को और सवारना है।
This cultural terrorism has been going
on right before we got independence till date. हमारे अनमोल ज्ञान को अब लोग अंधविश्वास कहते हैं, जबकि
विज्ञान वहॉ पर धीमी गति से, पहुँच रहा है, और जहॉ पहुँच गया है, तो उस पर अपना ट्रेड मार्क
लगा कर हमें ही बेच रहे हैं, this is the height of plagiarism.
एक बात और, जो यहॉ पर इशारों में लिखा जा रहा है, वह यह है – “किसी भी राष्ट्र
को चरखा घुमा के कभी भी आज़ाद कराया नहीं जा सकता !”
"The object of war is not to die for your country but to make the other bastard die for his." - George S. Patton
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