सर्वे भवन्तु सुखिन: सरवे सन्तु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माकश्चिद्दुखभागवेत् ।।
ओम् शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।
विद्या ददाति विनयम्, विनयम् ददाति पात्रक्त्वाम, पात्रक्त्वाधनमापनोति, धनाधर्मम् तत्सुखम् ।।
इन्सान आज के पागल हो गए हैं। आज हर किसी की यही शिकायत है कि चाहे कितना भी
पैसा कमा लो, उनके लिए कम ही रहता है। ईश्वर की कृपा हम सभ पर रही है परन्तु सब यह
भूल गए हैं कि “अति सर्वत्र
वर्जयेत्” यानि अति किसी भी
चीज़ की नहीं होनी चाहिए। इससे हमारा ही नुकसान है।
गौर करने कि बात है कि आज अमीरों के साथ दान-धर्म करने की क्षमता वक्त के साथ
घटती जा रही है। मसलन, आज कोई भी अगर किसी को भी कुछ भी देता है, तो यह सोच के
देता - बदले में देने वाले को फायदा हो। परन्तु लोग आज भी उतने ही कृतज्ञ हैं जितना
पहले थे। मान लैं कि आप किसी की मदद करते हैं और वह आपकी ओर अपने चहरे पर खुशी की
भावना से देखता है तो वह कृतज्ञता की भावना है, जैसे कि किसी वृद्ध की सहायता करना
तो बदले में उनका आशिर्वाद मिलना, किसी छोटे बच्चे की मदद करना तो उसकी आखों में
अपने प्रति आदर भावना को देखना और अगर हुआ तो उसकी प्रसन्नता के भाव आपके गाल पर
एक स्नेह युक्त चुम्मी लेना के रूप में उभरना। मैंने यह दो आयु वर्ग इसलिए लिखें
हैं क्योंकि पहले वर्ग ने अपनी ज़िन्दगी जी ली और वो दुनिया को इतना देख चुके हैं
कि उन्हें किसी युवा या धनी व्यक्ति से सहायता की आशा नहीं होती, और वह जब कृतज्ञता से
जब अपनी शुभकामनाएं देते हैं तो उस शुभकामना की शक्ति अपने माता-पिता की शुभकामना
के समान होती है। दूसरे वर्ग की बात करें तो वह वर्ग का मन छल कपट से मुक्त है और
पवित्र है, पवित्र मन की तो बात ही अलग होती है।
मैंने इस विषय पर इसलिए लिखा क्योंकि मैंने Rhonda Byrne की किताब The Secret पढ़ी और उस सन्देश को
रोज़मर्रा के जीवन से जोड़ पर देखने की कोशिश की है। ऐसे ही अगर धनी लोग दान धर्म करते हैं, तो सोच सकते हैं कि वह कितने शक्तिशाली लोग बन सकते
हैं, मगर यह इच्छा उनके ऊपर है, आशा तो यही है, कयोंकि 4-5 गाड़ियॉ होने के
बाद भी कईयों को चैन नहीं मिलता, कईयों को बस BMW या AUDI या latest model की चाह
है। अब देखते हैं आगे क्या होता है... प्रार्थना तो यही है, अब आगे ईश्वर की
इच्छा, as willed by the powers (beyond) that be.
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